विश्व पर्यावरण दिवस के दिन वाल्मी ने पेश की मिसाल, स्वयं की तकनीक विकसित कर रोपे हजारों पौधें https://ift.tt/eA8V8J

भोपाल। राजधानी में कलियासोत पहाड़ी स्थित मध्य प्रदेश जल एवं भूमि प्रबंध संस्थान, (वाल्मी) भोपाल ने विश्व पर्यावरण दिवस के लिए स्वयं की बनाई हुई तकनीक से हजारों पौधों का रोपड़ किया है। इसके साथ ही संस्थान ने 30 हैक्टेयर में एक तालाब का ननिर्माण भी किया है जो जल संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

आपको बता दें वाल्मी द्वारा विकसित तकनीक जापान की मियावाकी तकनीक पर शोध के बाद विकसित की गई है जो मियावाकी तकनीक से कई गुना सस्ती और अधिक लाभप्रद है। वाल्मी ने अपने परिसर में बंजर पड़ी जमीन पर इस तकनीक से 2 वर्ष के भीतर घना जंगल तैयार किया है, जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

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वाल्मी ने इस तकनीक का ईजाद तब किया था जब मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव मप्र इकबाल सिंह बैंस पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के एसीएस हुआ करते थे। इसी दौरान तत्कालीन एसीएस ने इस प्रोजेक्ट को बंजर जमीन पर शुरू करवाया था। उनका सुझाव था कि इस पद्धति का उपयोग कर व्यापक स्तर पर पौधरोपण किया जाए। जिस पर संस्थान के विशेषज्ञों ने मिलकर रिसर्च की और उसके बाद बंजर भूमि पर विभिन्न प्रजातियों के हजारों पौधों का रोपण किया जिस कारण आज बंजर भूमि हरियाली से आच्छादित है।

वाल्मी की संचालिका उर्मिला शुक्ला (आईएएस ) ने बताया कि अब इस पद्धति से संस्थान के विशेषज्ञों की मदद से राजधानी एवं प्रदेश में कई स्थानों पर पौधारोपण किया जा रहा है। कृषि संकाय विशेषज्ञ डॉ रविंद्र ठाकुर ने बताया कि इस पद्धति में किसी भी प्रकार की केमिकल का उपयोग नहीं किया जाता, यह पूरी तरह जैविक पद्धति है, जिसमें गन्ना वेस्ट, धान का भूसा, गोबर खाद, गोमूत्र का उपयोग किया जाता है।

संस्थान के विशेषज्ञ सुनील चौधरी ने बताया कि इस पद्धति से पौधरोपण करने से भूजल स्तर भी बढ़ता है, साथ ही इन पौधों में  प्रतिदिन कम पानी क़ी आवश्यकता पड़ती है।

इन पौधों का किया रोपण

छायादार, फलदार एवं औषधीय पौधों सहित महुआ, आम, नीम, मुनगा, जामुन, कचनार, शहतूत बरगद सहित अन्य पौधे लगाए।

प्रदेश के कई जिलों में और राजधानी में विभिन्न स्थानों पर किया रोपण

प्रदेश के विभिन्न जिलो में एवं राजधानी के अलग-अलग स्थानों पर इस पद्धति से जंगल विकसित करने का काम किया जा रहा है, इसके माध्यम से अब तक राजधानी में 13800 से अधिक पौधों का रोपण किया जा चुका है। 

वाल्मी ने अब तक राजधानी के विभिन्न स्थानों पर पौधे रोपित किये हैं जिसमे वाल्मी प्रदर्शन प्रक्षेत्र- 1400 पौधे, वाल्मी पहाड़ी 800 पौधे,वाल्मी स्वास्तिक- 1650 पौधे, वाल्मी खेल मैदान- 6400 पौधे, खजूरी सड़क- 300 पौधे, रविंद्र भवन- 600 पौधे, स्मार्ट सिटी- 1650, पॉलिटेक्निक कॉलेज- 800 हैं। इस प्रकार कुल 4190 वर्ग मीटर में इस पद्धति से 13800 पौधों का रोपण किया गया जो आज लहराते हुए वृक्ष का रूप ले रहे है।

पद्धति के लाभ, 01 वर्ष में 10 फीट से अधिक बढ़ जाते हैं पौधे।

स्थानीय प्रजाति के पौधे कम स्थान में लगा सकते हैं, यह सामान्य पौधरोपण से 10 गुना तेजी में बढ़ते हैं।

01 वर्ष में 10 से 15 फीट की ऊंचाई तथा 3 वर्ष में सघन वन तैयार हो जाता है।
 
पूर्ण रुप से जैविक तकनीक।

जल एवं मृदा संरक्षण के लिए अत्यंत उपयोगी एवं प्रभावशाली।

शहरी क्षेत्रों में जहां रिक्त भूमि अल्प मात्रा में रहती है वहां पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अत्यंत लाभप्रद।

जल, जंगल एवं जमीन के नैसर्गिक संवर्धन में सहायक।

जल संरक्षण एवं प्रबंधन के क्षेत्र में भी नवाचार कर रहा है वाल्मी

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वाल्मी जल संरक्षण के क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 2 वर्षों में हजारों युवाओं को जल- मित्र के रुप में प्रशिक्षित कर जल योद्धा के रूप में तैयार किया, साथ ही इस विषय पर इंटर्नशिप भी शुरू की गई। नैनो वॉटरसेट अवधारणा से ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए भी अभिनव प्रयास किए जा रहे हैं, नैनो वाटरसेट पद्धति मृदा संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण है।

संस्थान द्वारा 30 हेक्टेयर प्रदर्शन प्रक्षेत्र भूमि पर मॉडल प्रोजेक्ट के रूप में नैनो वाटर सेट अवधारणा के तहत जल संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इस योजना के क्रियान्वयन में बंजर भूमि के विकास हेतु जल ग्रहण क्षेत्र विकास तकनीकी के आधार पर विभिन्न मिट्टी व जल संरक्षण संवर्धन प्रबंधन एवं उपयोग की वैज्ञानिक विधियों का उपयोग कर भूमि को उत्पादन योग्य बनाया गया है।


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